::अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :::
दिया गुरुरानी ने बीस साल के संघर्ष से खड़ी की अपनी पहचान
:::एमए करने के बाद बीएड करने के दौरान खुद को स्वरोजगार से जोड़ा।
लोहाघाट। पहाड़ की महिलाएं अपनी मेहनत और हिम्मत से कठिन परिस्थितियों में भी नई राह बना लेती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी रीठा साहिब की रहने वाली दिया गुरुरानी की है, जिनकी करीब 20 साल की मेहनत आज रंग ला रही है। उन्होंने न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि चंपावत, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों में कई महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर पहाड़ी उत्पादों को नई पहचान दिलाई।
वर्ष 2005 में चंपावत के रीठा साहिब में रहने वाली दिया देवी ने पढ़ाई के साथ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया। वर्ष 2014 में एएम करने के बाद बीएड किया। इसी दौरान उन्होंने एक एनजीओ से जुड़कर काम शुरू किया। इस मंच के माध्यम से उन्होंने चंपावत के साथ-साथ अल्मोड़ा, पिथौरागढ, पौढी गढवाल आदि जगहों की कई महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ने का काम किया। लगातार काम और अनुभव के बाद करीब चार साल पहले दिया देवी ने खुद का पहाड़ी उत्पादों का कारोबार शुरू किया। जिसमें घर का बना अचार, पहाड़ी चावल, मंडुवे का आटा, अलग-अलग प्रकार की बड़ी, विभिन्न प्रकार के पहाड़ी पीसा नूण और अन्य पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं। जैसे-जैसे लोगों की मांग बढ़ती गई, उन्होंने लोहाघाट और चम्पावत रोडवेज बस अड्डे और पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर घाट के पास स्टॉल लगाना शुरू कर दिया। अब वह लोगों के ऑर्डर के अनुसार पहाड़ी उत्पाद लाती हैं और उन्हें बेचकर फिर अपने गांव रीठा साहिब लौट जाती हैं। दिया देवी की इस यात्रा में सबसे खास बात यह है कि शुरुआत में उन्हें न आर्थिक मदद मिली और न ही किसी सरकारी योजना का सहारा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अपने काम के साथ उन्होंने गांव की कई महिलाओं को भी जोड़ा और उन्हें घर बैठे रोजगार का अवसर दिया। आज कई महिलाएं उनके साथ काम कर अपनी आय अर्जित कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। हालांकि प्रशासन से उन्हें कोई सीधी आर्थिक सहायता नहीं मिली, लेकिन डीएम मनीष कुमार ने कई बार उनके प्रयासों की सराहना की, जिससे उनका मनोबल बढ़ा। दिया ने कहा कि मेहनत के दम पर कोई भी महिला स्वरोजगार कर अपने परिवार का आसानी से भरण-पोषण कर सकती है।
























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