लेखक : शैलेश मटियानी पुरस्कार प्राप्त शिक्षक नरेश जोशी
लोहाघाट। पहाड़ों की संस्कृति और परंपराओं में नवरात्र केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और आस्था से जुड़ने का अवसर भी है। इसी परंपरा को जीवंत बनाए रखने में कई लोग अपने पेशेवर जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद योगदान देते हैं। ऐसे ही उदाहरण हैं शिक्षक गिरीश राय, जो अपने कार्यक्षेत्र से समय निकालकर प्रतिवर्ष रामलीला मंच पर अंगद के किरदार में जान डालते हैं।
गिरीश राय का रामलीला से जुड़ाव वर्ष 1984 में हुआ, जब नर सिंह ढेक रामलीला कमेटी के अध्यक्ष थे। उसी समय उन्होंने पहली बार लक्ष्मण का किरदार निभाकर मंच पर कदम रखा। उस दौर में रामलीला में आज जैसी रोशनी और सजावट नहीं होती थी। कलाकार ही दर्शकों को बांधे रखने के लिए हास्य और भावनात्मक भूमिकाएं निभाते थे। गिरीश राय भी हास्य अभिनय में भी अपनी प्रतिभा दिखाने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने मेघनाथ, हनुमान और अंगद जैसे महत्वपूर्ण पात्रों को भी निभाना शुरू किया। समय के साथ अंगद की भूमिका उनके जीवन का हिस्सा बन गई। हर वर्ष वे अंगद के रूप में लोहाघाट के मंच पर अपनी छाप छोड़ते हैं। उनकी संवाद अदायगी और अभिनय शैली के कारण उन्हें क्षेत्र में विशेष रूप से अंगद का कलाकार कहा जाने लगा। वर्ष 1993 इनको सरकारी सेवा में मुनस्यारी जैसे दूरस्थ क्षेत्र में कार्य करने जाना पड़ा लेकिन कठिन परिस्थितियों और व्यस्त शैक्षिक जीवन के बावजूद उन्होंने रामलीला से दूरी नहीं बनाई। उनका कहना है रामलीला मेरे लिए केवल अभिनय नहीं बल्कि पूजा का एक रूप है। 1990 के दशक में उन्होंने पहाड़ी गीत-संगीत की ओर भी कदम बढ़ाए। उनकी ऑडियो कैसेट ‘चम चम तारा’ उस दौर में काफी लोकप्रिय हुई। बाद में, जब रामलीला की बागडोर जीवन सिंह मेहता के पास आई, तब उनके मार्गदर्शन में गिरीश राय ने यूट्यूब जैसे आधुनिक माध्यमों का सहारा लिया। उन्होंने पहाड़ों के मंदिरों के संरक्षण, देवी-देवताओं और उनकी आस्था पर आधारित वीडियो बनाकर युवाओं को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया। 1989 में टनकपुर स्थानांतरण के बाद भी गिरीश राय ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा को जारी रखा। वर्तमान में वे उधमसिंह नगर जनपद के खटीमा ब्लॉक के राजकीय इंटर कालेज बंडिया बतौर शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं और लगातार 8 वर्षों से शिक्षक संगठन में ब्लॉक अध्यक्ष और खेल समन्वयक जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं। इसके बावजूद हर वर्ष वे लोहाघाट पहुंचकर अंगद का किरदार निभाते हैं और रामलीला की परंपरा को जीवित रखते हैं। गिरीश राय की यह निरंतरता और आस्था केवल व्यक्तिगत समर्पण नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक प्रेरणा है। एक शिक्षक होते हुए वे जिस तरह मंच पर अंगद का रूप धारण कर लोगों को धर्म और संस्कृति से जोड़ते हैं, वह सराहनीय है।





















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