Home उत्तराखंड एक ही त्योहार की दो तारीख़ें होना हास्यास्पद है : शशांक पाण्डेय
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एक ही त्योहार की दो तारीख़ें होना हास्यास्पद है : शशांक पाण्डेय

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हमारे देश में आस्था की गहराई जितनी विशाल है, उतनी ही गहरी हो चली है तारीख़ों की उलझन। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहार—जो एक समय पूरे समाज को एक सूत्र में बाँधने का काम करते थे—आजकल अलग-अलग तारीख़ों में बँटकर मानो खुद ही असमंजस में खड़े दिखाई देते हैं। स्थिति यह है कि एक ही घर में व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और मोहल्ले के पंडित जी के कैलेंडर में टकराव हो जाता है। नतीजा—त्योहार से पहले ही “त्योहार कब है?” यह सवाल बड़ा हो जाता है।

कभी आधा देश एक दिन पहले लक्ष्मी पूजन कर लेता है, तो आधा देश अगले दिन दीप जलाता है। जन्माष्टमी में कोई रात भर झूला झुला चुका होता है, तो किसी के यहाँ अगले दिन माखन-मिश्री चढ़ती है। होली भी कभी रंगों के साथ खेली जाती है, तो कहीं उसी दिन होलिका दहन हो रहा होता है। और अब तो चैत्र नवरात्र भी इस बहस का नया केंद्र बन गया है—कोई 19 मार्च को घट स्थापना करने पर अड़ा है, तो कोई 20 मार्च को ही “सही मुहूर्त” बता रहा है।

अब आम आदमी करे तो क्या करे? एक तरफ़ श्रद्धा है, दूसरी तरफ़ “कौन सही है” का गणित। दफ्तर में छुट्टी एक दिन मिलती है, लेकिन पंडित जी कहते हैं—“नहीं, असली पूजा तो अगले दिन है।” ऐसे में भक्त बेचारा अपनी आस्था को किस दिन के साथ जोड़े—यह सवाल उससे ज्यादा परेशान करता है, जितना कोई ग्रह-नक्षत्र नहीं करते।

असल में समस्या गणना की नहीं, “अलग-अलग गणनाओं की एक साथ मौजूदगी” की है। पंचांग बनाने की परंपरा प्राचीन है और उसके पीछे गहरी खगोलीय गणनाएँ हैं। लेकिन आज जब हर पंडित, हर संस्था, हर परंपरा अपने-अपने हिसाब से तिथियाँ तय कर रही है, तो एक सामूहिक त्योहार व्यक्तिगत कैलेंडर में बदलता जा रहा है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक ही ट्रेन के लिए हर स्टेशन अपना अलग समय घोषित कर दे—यात्री प्लेटफॉर्म पर ही रह जाएगा।

थोड़ा कटाक्ष करें तो लगता है कि भगवान भी ऊपर बैठकर सोचते होंगे—“भक्तों, पहले आप लोग तय कर लो कि मुझे किस दिन याद करना है, मैं उसी दिन दर्शन दे दूँगा!” आस्था का जो एक स्वर होना चाहिए था, वह अब बहस का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने “सही” होने के प्रमाण दे रहे होते हैं, जैसे कोई परीक्षा चल रही हो और सब अपने उत्तर को सही साबित करने में लगे हों।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका कोई समाधान नहीं? क्या हम हमेशा इसी उलझन में रहेंगे कि त्योहार आज है या कल?

समाधान है, लेकिन उसके लिए थोड़ी सामूहिक सोच और व्यवस्था की ज़रूरत है। सबसे पहले, देश स्तर पर एक मानक पंचांग को स्वीकार करने की पहल होनी चाहिए। जैसे भारत में समय के लिए “इंडियन स्टैंडर्ड टाइम” है, वैसे ही त्योहारों के लिए भी एक “मानक तिथि निर्धारण प्रणाली” होनी चाहिए, जिसे सभी प्रमुख धार्मिक संस्थाएँ मिलकर तय करें। यह काम किसी एक पंडित या संस्था का नहीं, बल्कि सामूहिक सहमति का विषय होना चाहिए।

दूसरी बात, वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का संतुलन बनाना होगा। खगोल विज्ञान और ज्योतिष के बीच समन्वय करके ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो परंपरा का सम्मान भी करे और एकरूपता भी बनाए रखे। आज के समय में जब हम चाँद पर पहुँचने की बात कर रहे हैं, तो चाँद की स्थिति के आधार पर एक तय तारीख़ निकालना असंभव नहीं होना चाहिए।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात—संचार। जो भी अंतिम निर्णय हो, उसे स्पष्ट रूप से पूरे देश में प्रचारित किया जाए। टीवी, रेडियो, अखबार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक ही तिथि को आधिकारिक रूप से बताया जाए, ताकि आम जनता को भ्रम न हो। अगर सरकार या कोई केंद्रीय धार्मिक परिषद इस दिशा में पहल करे, तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है।

और अंत में, हमें यह भी समझना होगा कि त्योहार तिथि का नाम नहीं है, वह भावना का नाम है। अगर किसी कारणवश एक दिन का अंतर आ भी जाए, तो आस्था कम नहीं होती। लेकिन जब यह अंतर बार-बार और हर बड़े त्योहार में होने लगे, तो वह एकता को कमजोर करता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम इस मुद्दे को हल्के में न लें, बल्कि गंभीरता से सोचें।

त्योहार हमें जोड़ने के लिए होते हैं, बाँटने के लिए नहीं। अगर एक ही देश में, एक ही धर्म के लोग अलग-अलग दिनों में एक ही भगवान की पूजा करें, तो यह विविधता नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमी का संकेत है। अब समय आ गया है कि हम इस “तारीख़ों के धर्मसंकट” से बाहर निकलें और एक ऐसी व्यवस्था बनाएं, जिसमें आस्था के साथ-साथ एकता भी बनी रहे।

वरना आने वाले समय में यह सवाल और गहरा हो जाएगा—“त्योहार कब है?” और शायद इसका जवाब भी होगा—“आप अपने-अपने पंडित जी से पूछ लीजिए!”

(लेखक शशांक पाण्डेय लोहाघाट निवासी एवं स्वतंत्र व्यंग्यकार हैं)

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कुमाऊँ बुलेटिन के लेखक, जो उत्तराखंड की खबरों और घटनाओं पर विशेष ध्यान देते हैं। अपने शोध और लेखन के माध्यम से, ये लेखक पाठकों को राज्य की राजनीति, समाज, पर्यावरण, पर्यटन, खेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी, अपराध और मनोरंजन की ताजा और प्रामाणिक जानकारी प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य है कि पाठकों को स्थानीय घटनाओं और मुद्दों की सही और विस्तृत जानकारी मिले, जिससे वे अपने राज्य की गतिविधियों से जुड़े रहें और जागरूक रहें।

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