लोहाघाट। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने बैठक कर सत्तादलों को राज्य की मूल अवधारणा से भटकने का आरोप लगाया। इस दौरान वक्ताओं ने पहाड़ की समस्याओं के समाधान के लिए ठोस और प्रभारी नीति की जरुरत बताई।
रविवार को प्रमुख राज्य आंदोलनकारी नवीन मुरारी की अध्यक्षता और सुरेन्द्र बोहरा के संचालन में बैठक हुई। जिसमें राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि उत्तराखंड रजत जयंती वर्ष मना रहा है। उन्होंने कहा कि जिस अवधारणा से राज्य का गठन किया गया है। उसे पूरी तरह से भुला दिया गया है। विकास की बाते सिर्फ भाषणों तक सीमित है। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी आजिविका का आधार रही कृषि का दायरा लगातार सिमट रहा है। युवा पीढी के पलायन, वन्य जीवों के उत्पात और कम उपज से खेतों को विरान कर दिया है। राज्य बनने से पहले पहाड़ आबाद थे, जो अब विरान हो रहे हैं, जबकि राज्य निर्माण का मकसद इन गांवों को विकास से जोड़ना था। सरकारों का ध्यान गांव की ओर गया ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार को मजबूत किया होता तो हालात खराब न होते। राष्ट्रीय दलों ने शहीदों के सपनों के इस राज्य को सिर्फ सत्ता की पाठशाला बनाकर छोड़ा है। सत्तादलों ने कभी भी आंदोलनकारियों की मंशा को समझने का प्रयास नहीं किया। जिससे आज बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोग तरस गए हैं। सरकार को चाहिए कि वह रिवर्स माइग्रेशन को बढावा दे। पहाड़ की समस्या के समाधान के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। इस मौके पर राज्य आंदोलनकारी प्रहलाद सिंह मेहता, बृजेश माहरा, भूपेश देव, पूरन उप्रेती, राजू गड़कोटी, भुवन जोशी, राजकिशोर ओली, राम सिंह बोहरा, विजय ढेक, नवीन खर्कवाल, नवीन ओली, कैलाश चिल्कोटी, जोगा सिंह देव, हरीश उप्रेती, अर्जुन सिंह ढेक, सुरेश सिंह ढेक आदि मौजूद रहे।






















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