लोहाघाट। अद्वैत आश्रम मायावती में स्वामी विवेकानंद की जयंती भारतीय पंचांग के अनुसार धूमधाम के साथ मनाई गई। इस दौरान विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।
मंगलवार को अद्वैत आश्रम मायावती लोहाघाट में तिथि के अनुसार स्वामी विवेकानंद की जयंती को मनाया गया। रामकृष्ण मिशन और अद्वैत आश्रम से जुड़ाव रखने वाले लोहाघाट के शशांक पांडेय ने बताया कि यूं तो स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को देश-विदेश में मनाई जाती है। लेकिन रामकृष्ण मिशन और उससे जुड़े हुए देश-विदेश के केंद्रों में यह आयोजन भारतीय पंचांग अनुसार तिथि को देखते हुए मनाया जाता है। इस दौरान आश्रम के स्वामी शांतचित्तानन्द महाराज ने अपने उद्बोधन में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन दर्शन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वामी विववेकानंद का जीवन काल वैसे तो बहुत छोटा रहा, परंतु उन्होंने इस छोटे जीवन काल में ही संपूर्ण जीवन जी लिया था। उन्होंने इतने छोटे काल में ही इस देश, समाज और धर्म को बहुत कुछ दिया। स्वामी जी अपनी जिज्ञासाएं शांत करने के लिए ब्रह्म समाज के अलावा कई साधु-संतों के पास गये और अंतत: वे रामकृष्ण परमहंस की शरण में गए। रामकृष्ण के रहस्यमय व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया, जिससे उनका जीवन बदल गया और रामकृष्ण को उन्होंने अपना गुरु बनाया। संन्यास लेने के बाद उनका नाम विवेकानंद हुआ। स्वामी शांतचित्तानन्द महाराज ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर वह उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे, किंतु रामकृष्ण परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से उनको आत्म-साक्षात्कार हुआ जिसके फलस्वरूप वह परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए।
उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। गरीब, निर्धन और सामाजिक बुराई से ग्रस्त देश के हालात देखकर वह दुःख और दुविधा में रहे। उसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। उस वक्त यूरोप अमेरिका के लोग पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। उन्होंने क़िस्सा बताया कि एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला और उसके बार पूरे विश्व ने भारत की मेघा को पहचाना। इस दौरान स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने कर्मयोग, ज्ञानयोग,भक्ति योग और राजयोग पर भी जानकारी दी। उन्होंने लोगों से स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को जीवन में उतारने पर बल दिया। कार्यक्रम में स्वामी गुणोंतमानंद,स्वामी एकदेवानंद,भास्कर मुरारी, सतीश पांडेय, कुलदीप देव, विनोद बगौली,कीर्ति बगौली,त्रिभुवन उपाध्याय,जगदीश अधिकारी, प्रदीप ढेक, शेखर पुनेठा,सुमित पुनेठा, कमल सिंह,विजय पुनेठा,बसंत पंगरिया समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।






















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