लेखक : शशांक पाण्डेय (लोहाघाट, ज़िला चम्पावत के निवासी एवं लोक संस्कृति प्रेमी है)
उत्तराखण्ड का कुमाऊँ अंचल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के पर्व-त्योहार केवल धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं होते, बल्कि लोकजीवन के उत्सव होते हैं, जो समाज को एक सूत्र में बाँधते हैं और संस्कृति की धड़कन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख और अत्यंत लोकप्रिय पर्व है गौरा पर्व, जिसे कुमाऊँ के गाँव-गाँव और शहरों में अत्यधिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
गौरा पर्व का संबंध भगवान शिव और पार्वती के विवाह से जुड़ा हुआ है। कुमाऊँनी समाज में पार्वती को गौरा कहा जाता है और शिव को महेश या शंकर। यह पर्व पति-पत्नी के पवित्र बंधन, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। लोकमान्यता है कि गौरा देवी अपने मायके से ससुराल यानी कैलाश पर्वत जाती हैं। इसीलिए इस पर्व में उनके प्रस्थान और विवाह की रस्में निभाई जाती हैं। महिलाएँ गौरा और महेश की पूजा करके अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करती हैं।
गौरा पर्व का आयोजन भाद्रपद मास में होता है। पर्व की शुरुआत घरों और मंदिरों में गौरा-महेश की प्रतिमाएँ बनाने से होती है। इन प्रतिमाओं को मिट्टी, लकड़ी या केले के तने से तैयार किया जाता है और उन्हें रंग-बिरंगे कपड़ों, आभूषणों और फूलों से सजाया जाता है। गाँव की महिलाएँ सामूहिक रूप से एकत्र होकर गीत गाती हैं, पूजा करती हैं और प्रतिमाओं को डोले में रखकर गाँव के चौक या मंदिर तक ले जाती हैं। यहाँ गौरा-महेश के विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। इस विवाह में बारात, जयमाल और विदाई जैसे सभी पारंपरिक संस्कार पूरे उल्लास के साथ निभाए जाते हैं।गौरा पर्व की सबसे खास पहचान है इसके लोकगीत और नृत्य। महिलाएँ सामूहिक रूप से झोड़ा, चांचरी और हुड़का नृत्य करती हैं। गीतों में पार्वती और शिव की कथा, विवाह के प्रसंग और वैवाहिक जीवन के संस्कारों का वर्णन होता है। साथ ही इन गीतों में ग्रामीण जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। खेती-बारी, मौसम, रिश्ते-नाते और स्त्री-पुरुष के भावनात्मक संबंध इन गीतों में स्वाभाविक रूप से समाए रहते हैं। ढोल-दमाऊं, नगाड़ा और हुड़का जैसे वाद्ययंत्र जब बजते हैं तो पूरा वातावरण गूँज उठता है और पर्व का उल्लास चरम पर पहुँच जाता है।
गौरा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सामूहिकता का प्रतीक भी है। इस दिन सभी मतभेद भुलाकर लोग एक साथ आते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं। महिलाएँ और पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग, सभी इसमें समान भागीदारी करते हैं। यह पर्व समाज को जोड़ने वाला,






















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